🔱गुरू तत्व ही ईश्वर तत्व है – यदि पूर्ण श्रद्धा हो
आज के समय में गुरू और शिष्य का मापदंड बदल गया है।
ना अब वैसे गुरू रहे, ना वैसे शिष्य।
अब लोग गुरू बनाते हैं तो केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए – ना श्रद्धा, ना समर्पण, ना विश्वास।
गुरू से मंत्र तो लिया जाता है, वचन तो सुने जाते हैं,
मगर जब मन में ही प्रश्न उठता रहे कि –
“ये करो तो मानू!”
तो यह केवल देह को गुरू मानने की भूल है, गुरू तत्व को नहीं।
🙏 जब विश्वास ही नहीं तो गुरू क्यों?
अगर आपने किसी को गुरू बनाया है, तो उस पर पूर्ण विश्वास और समर्पण होना चाहिए।
गुरू केवल एक मनुष्य नहीं, वह एक ऊर्जा है, एक तत्व है, ब्रह्म का स्वरूप है।
गुरू के शरीर में दोष हो सकते हैं, पर गुरू तत्व में नहीं।
गुरू तत्व ही शिष्य पर कृपा करता है।
वही रक्षा करता है, वही ज्ञान देता है, वही साधना को सिद्ध करता है।
आप जितनी श्रद्धा से गुरू मंत्र का जाप करते हैं, उतनी ही कृपा आप पर गुरू तत्व करता है।
🌿 एकलव्य से सीखिए – सच्चा विश्वास क्या होता है
एकलव्य ने केवल मिट्टी की मूर्ति बनाई थी,
मगर श्रद्धा और समर्पण ऐसा था कि
स्थूल गुरू की कृपा न होते हुए भी,
गुरू तत्व ने उसे धनुर्विद्या में पारंगत बना दिया।
द्रोणाचार्य ने उसे प्रत्यक्ष कभी नहीं सिखाया,
परंतु उसके अंदर का गुरू भाव और श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि
गुरू तत्व स्वयं उसे सिद्ध कर गया।
गुरू तत्व की कृपा, शरीर की उपस्थिति पर नहीं,
आपके विश्वास पर निर्भर करती है।
🌸 इतिहास में अनेकों उदाहरण
- वाल्मीकि ने “मरा-मरा” जप कर भगवान को पाया।
- तुलसीदास, कबीर, इन महान संतों ने गुरू की चेतना को हृदय से अपनाया,
गुरू को कभी प्रत्यक्ष जानने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
⚠️ आज के समय की विकृति
आज तंत्र की दुनिया में बहुत से लोग गुरू बनाकर परीक्षण करते हैं।
“पहले फल दिखाओ, फिर मानूंगा” — ऐसा कहना गुरू तत्व का अपमान है।
क्या एकलव्य ने कभी अपनी मूर्ति से कहा था –
“धनुष चलाकर दिखाओ, तभी गुरू मानूंगा?”
गुरू तत्व को चुनौती नहीं,
श्रद्धा और समर्पण चाहिए।
🌺 तंत्र साधना में प्रथम पूज्य गुरू होते हैं
तंत्र हो या मंत्र, योग हो या भक्ति —
सभी मार्गों की पहली सीढ़ी है गुरू तत्व का पूजन,
क्योंकि वही आपको साधना के रहस्यों तक ले जाता है।
